मुगल और अंग्रेजों से पहले भारत कैसा था? चरक से विवेकानंद तक ज्ञान की महान परंपरा

Sun 01-Feb-2026,02:10 AM IST +05:30

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मुगल और अंग्रेजों से पहले भारत कैसा था? चरक से विवेकानंद तक ज्ञान की महान परंपरा Ancient India: Icons of Wisdom and Faith
  • प्राचीन भारत ज्ञान, दर्शन और विज्ञान का वैश्विक केंद्र था.

  • ऋषि-मुनियों और आचार्यों ने मानव चेतना को दिशा दी.

  • भारत की पहचान शासन से नहीं, विचारों से बनी.

Maharashtra / Nagpur :

Nagpur / जब कोई यह पूछता है कि मुगल और अंग्रेजों के आने से पहले भारत कैसा था, तो यह सवाल केवल इतिहास नहीं, हमारी स्मृति और आत्मसम्मान से जुड़ा होता है। ऐसे में शब्दों से ज्यादा असर एक कहानी का होता है—एक ऐसी कहानी, जो समय की धूल हटाकर उस भारत को सामने ले आए, जो ज्ञान, विचार और चेतना से भरा हुआ था।

कल्पना कीजिए, एक युवा अपने बुज़ुर्ग से यह सवाल करता है। बुज़ुर्ग मुस्कुराते हैं, कुछ नहीं कहते, बस एक तस्वीर दिखाते हैं—तस्वीर नहीं, बल्कि नामों की एक श्रृंखला। और फिर कहानी शुरू होती है।

वे कहते हैं—
“यह भारत तलवारों से पहले विचारों का देश था।”

चरक को देखो, जिन्होंने आयुर्वेद को केवल चिकित्सा नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन बनाया। शरीर, मन और आत्मा का संतुलन सिखाया।
पाणिनि को देखो, जिन्होंने संस्कृत व्याकरण को ऐसे सूत्रों में बांधा कि आज भी आधुनिक भाषाविज्ञान चकित है।
पतंजलि योग लेकर आए—शरीर को साधने का विज्ञान, मन को शांत करने की विधि।

फिर ध्यान जाता है कश्मीर की ओर, जहाँ आचार्य अभिनवगुप्त शैव दर्शन में चेतना और सौंदर्य का अद्भुत संगम रच रहे थे।
तिब्बत में थोनमी संभोटा भारत से ज्ञान लेकर वहाँ की लिपि गढ़ रहे थे—भारत केवल सीख नहीं रहा था, सिखा भी रहा था।

गौतम बुद्ध खड़े हैं—करुणा, अहिंसा और मध्यम मार्ग के साथ।
महावीर हैं—संयम और आत्मअनुशासन का संदेश देते हुए।
वेदव्यास हैं—महाभारत और पुराणों के माध्यम से जीवन की जटिलताओं को कथा में ढालते हुए।

कालिदास की कविता में प्रकृति बोलती है।
आर्यभट आकाश की ओर देखते हैं और गणित को भाषा देते हैं।
चाणक्य राजनीति को नैतिकता से जोड़ते हैं—राज्य केवल शक्ति नहीं, जिम्मेदारी भी है।

दक्षिण में तिरुवल्लुवर नैतिक जीवन के सूत्र लिख रहे हैं।
आदि शंकराचार्य अद्वैत वेदांत से पूरे भारत को वैचारिक सूत्र में बाँध रहे हैं।
रामानुजाचार्य और मध्वाचार्य भक्ति और दर्शन के अलग-अलग मार्ग दिखा रहे हैं।

उत्तर में गुरु नानक खड़े हैं—जाति, भेद और आडंबर के विरुद्ध मानवता की बात करते हुए।
असम में शंकरदेव लोकभाषा में भक्ति को जन-जन तक पहुँचा रहे हैं।
विष्णु शर्मा पंचतंत्र के माध्यम से बच्चों को नीति सिखा रहे हैं—कहानी के ज़रिये।

भर्तृहरि जीवन के वैराग्य और व्यवहार दोनों पर लिखते हैं।
अश्वघोष बुद्धचरित के ज़रिये दर्शन को काव्य बनाते हैं।
हेमचंद्र भाषाओं को सहेजते हैं।

और फिर आधुनिक काल की दहलीज़ पर—
स्वामी विवेकानंद आत्मविश्वास की आवाज़ बनते हैं।
दयानंद सरस्वती वैदिक चेतना की ओर लौटने का आह्वान करते हैं।
श्री अरबिंदो भारत को केवल राष्ट्र नहीं, चेतना के रूप में देखते हैं।

बुज़ुर्ग कहानी रोकते हैं और कहते हैं—
“यह भारत था। यह वह देश था, जो दूसरों पर शासन करने से पहले खुद को जानता था।”

फिर वे धीरे से कहते हैं—
“जब कोई पूछे कि मुगलों और अंग्रेजों से पहले भारत कैसा था,
तो बहस मत करना…
बस उन्हें ये तस्वीर दिखा देना।”